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Tuesday, March 20, 2012

अच्छा, मैं चलता हूँ...


We are but travelers, much like birds who build temporary nests and move on seeking better... While we move from one station to another, we meet new people and build new bonds. But, each time, we leave little marks of ourselves and little fragments that just cling on, never to let go. These fragments serve as reminders of the days that were.

The following poem tries to capture these thoughts…


खाली है कमरा, खाली ये अल्मारी,
खाली है मन मेरा, खाली ये तन्हाई|
भर गया है ये बक्सा, काफ़ी भारी हो गया है...
यादों का ये बोझ, क्या इससे कभी उभरा हूँ मैं?

कुछ छोटी-मोटी चीज़ें यूँ ही बिखरी पड़ी हैं--
इनको साथ ले जाना मुम्किन नहीं|
बहुत सारी यादें ज़हन में छिपी पड़ी हैं--
सबका ज़िक्र हो पाये: ये मुम्किन नहीं|

सपनों की किरकिरी आँखों को सताती है,
सपनों की ये डोर हमें दूर खीचें ले जाती है|
सपनों के इस सफ़र में...
हम मिले थे इस प्लेटफोर्म पर --
साथ पढ़े, लड़ें, जियें, मुस्कुराएँ --
मेरी अगली गाड़ी का announcement हो गया है,
तुम्हारी भी आती ही होगी...

यादों के इस बोझ से क्या कभी उभरुंगा मैं...?
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